स्वतंत्रता और दिव्यांगता: एक दार्शनिक दृष्टि

प्राचीन काल से लेकर उत्तर-आधुनिक काल की यात्रा में स्वतंत्रता नामक शब्द के स्वरुप पर कई दार्शनिको ने विचार-विमर्श किया हैंI आखिर स्वतंत्रता के कौन- कौन से मूल्य होने चाहिए?, किसकी स्वतंत्रता?, किससे स्वतंत्रता? और किस प्रकार की स्वतंत्रता? क्या स्वतंत्रता को हम किसी अवधारणा के परे सोच सकते हैं जिसमे उसका वास्तविक सार दिखाई दे या हम उसे देख सके? इस लेख में हमें दिव्यांगो की स्वतंत्रता से सम्बन्धित विचार पर दृष्टिपात करना हैं जिसमे मैं, स्वतंत्रता की सामान्य समझ और एक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर विचार करते हुए इसके साथ ही साथ दिव्यांगो के प्रति समाज के पूर्वाग्रह पर दृष्टि डालते हुए और एक राष्ट्र निर्माण के भाव की यात्रा में व्यक्ति की स्वतंत्रता की भूमिका और उसकी महत्वता को समझने का प्रयास करूँगाI

जर्मन दार्शनिक कांट लिखते हैं कि, “प्रत्येक व्यक्ति के पास स्वतंत्रता का अधिकार जन्मजात है और उसे अपनी स्वतंत्रता को पूरी तरह से महसूस करने और उसे सुरक्षित करने के लिए सामाजिक समझौता करने का भी अधिकार हैंI” इसप्रकार कांट यहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर विचार कर रहे हैं और स्वतंत्रता को वो जन्मजात मानते हुए उसे सुरक्षित रखने की भी बात कर रहे हैंI

सामाजिक-राजनीतिक दार्शनिक जे एस मिल किताब ऑन लिबर्टी के चतुर्थ अध्याय में लिखते हैं कि,”सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण रूप से स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए बशर्ते वह अपनी असीमित स्वतंत्रता से किसी को नुकसान न पहुचायेI”

उपर्युक्त विचारो से हमारी समझ इतनी तो बनी होगी कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्र रहने का अधिकार प्राप्त हैं चाहे फिर किसी व्यक्ति के शरीर के किसी अंग में खराबी क्यूँ न होI यहाँ मैं सामान्य व्यक्ति बनाम दिव्यांग व्यक्ति की केस स्टडी के माध्यम से चर्चा करूँगा जोकि निम्नलिखित हैं-

सामान्य व्यक्ति बनाम दिव्यांग व्यक्ति-

1-आप ही सोचिये कि जो व्यक्ति दिव्यांग हैं क्या वो स्कूल नही जाता? क्या वो शादी नही करता? क्या वो बच्चे पैदा नही कर सकता? क्या वो मकान नही खरीद सकता? ये सभी कार्य एक वो भी व्यक्ति कर सकता हैं जो दिव्यांग नही हैं तो केवल दिव्यांग के लिए ऐसा पूर्वाग्रह क्यूँ की उसके स्वतंत्रता के लिए हमें आवाजे उठानी पड़ रही हैंI स्वतंत्र जीवन जीना प्रत्येक व्यक्ति का हक है और इसका साफतौर पर यही मतलब होता हैं कि स्वतंत्र जीवन वह हैं जिसमे व्यक्ति के निर्णयों और उसकी इच्छाओ पर सिर्फ उसी का नियंत्रण होI

2- मेडिकल साइंस में डॉक्टर का मानना है कि दिव्यांगता का मतलब यह हैं कि किसी व्यक्ति के शरीर के किसी अंग में खराबी होना या डेफेक्ट होना समझा जाता हैंI सामान्तया डॉक्टर का कहना होता हैं इनको सहारे की जरूरत हैं या यूँ कहे उन्हें अपने निर्णयों को लेने में या जीवन को दिशा देने में किसी एक्सपर्ट की जरूरत होती हैं और यहाँ तक कि कभी कभी उनकी सहमति को भी अनदेखा कर दिया जाता हैं और इसप्रकार दिव्यांगो की स्वतंत्रता और उनके निजी अधिकारों का हनन कर दिया हैंI

उपर्युक्त केस स्टडी के माध्यम से हमें यह समझ आया कि दिव्यांग जब सभी दैनिक क्रियाये करने में समर्थ हैं तो उनकी स्वतंत्रता को प्रतिबंधित कैसे किया जा सकता हैंI इसप्रकार हमारी यही समझ बनती हैं कि किसी भी व्यक्ति/ फैमिली मेम्बर/ गवर्मेंट एजेंसी/ एजुकेटर/ एम्प्लायर और मेडिकल प्रोफेशनल को यह अधिकार नही हैं कि वो उनके किसी एक अंग में डिफेक्ट होने के कारण उनके निर्णय, उनकी सहमति को अनदेखा करेI इसप्रकार दिव्यांगो की स्वतंत्रता को बरक़रार रखा जा सकता हैंI

निष्कर्ष- उपर्युक्त चर्चा में मेरे द्वारा दिव्यांगो कीस्वतंत्रता के विषय में एक दार्शनिक दृष्टि से उनकी स्वतंत्रता को सकारात्मक रूप से समझने का प्रयास किया गया हैं और दिव्यांग व्यक्तियों को भी सामान्य व्यक्ति से एक तुलनात्मक दृष्टि से भी समझने का प्रयास किया हैंI परन्तु मैं कुछ सकारात्मक निष्कर्षो को रखना चाहता हूँ जोकि निम्नलिखित हैं-

  1. समाज को पूर्वाग्रह से बाहर आने की जरूरत हैंI क्योंकि हम दुनिया को अब एक कृत्रिम चश्मे से देखते हैं जबकि हमें मानवीय द्रष्टि का प्रयोग करना होगाI उदहारण रूप में हम एरा सिंघल जो वर्तमान में एक आईएएस हैं और स्टीव हॉन्किंग नामक विद्वान से कौन परिचित नही होगाI अगर इन दोनों दिव्यांग व्यक्तियों को स्वतंत्रता न प्राप्त हुई होती तो शायद मैं इनके उदाहरण यहाँ पेश न कर पाता और साथ ही साथ ये दोनों व्यक्ति राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान नही दे पातेI
  2. समाज में हमें नैतिक मूल्यों को भी विकसित करना होगा ताकि हम दिव्यांगो के प्रति अपना नजरिया को संतुलित रखते हुए उन्हें भी मानवीय दृष्टि से देखेI उनके साथ गलत-व्यवहार और उनके आत्म-सम्मान को ठेस न पहुचायेI इसके निदान के लिए हमें बच्चो को विद्यालय के दौरान ही उन्हें इस शिक्षा से अवगत कराना प्रारम्भ कर देना चाहिएI
  3. भारतीय समाज के मूल्यों में “वसुधैव कुटुम्बकम” नामक विचार अन्तर्निहित हैंI इसलिए हमें सम्पूर्ण समाज को एक परिवार मानते हुए उनका सहयोग करना चाहिए, चाहे फिर वो दिव्यांग ही क्यों न हो, इससे समाज में समरसता का भाव पैदा होगाI
  4. अधिकांश व्यक्ति अपने सम्पूर्ण जीवन के अनुभव में कही न कही अपने शरीर के अंगो में डिफेक्ट का अनुभव करते होंगेI यह जीवन का एक हिस्सा मात्र हैंI इससे जीवन समाप्त नही होता हैंI हो सकता हैं आपने अनुभव नही किया होगा तो आपके परिवार, आपके दोस्त कर रहे होंगेI क्या इस समस्या मात्र से आप किसी के निर्णयों को या उसकी सहमति को अनदेखा करेंगेI उनकी स्वतंत्रता का हनन होने देंगे? शायद आप इस बात को स्वयं आत्मसात करेंगे तो शायद अच्छे से इसका निदान खोज सकते हैंI

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